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राजनीति

मुख्यमंत्री बने फिर भी झोपड़ी में रहे, पिछडों के लिए लड़ी लड़ाई…कौन हैं कर्पूरी ठाकुर, जिन्हें मिलेगा भारत रत्न

Karpoori Thakur Bharat Ratna: कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके है. मोदी सरकार ने 23 जनवरी को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की.

Karpoori Thakur
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Karpoori Thakur Bharat Ratna: कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रह चुके है. पहली बार दिसंबर 1970 से जून 1971 तक और फिर दूसरी बार जून 1977 से अप्रैल 1979 तक वे नाई समुदाय से थे। अपनी सादगी के लिए वे जाने जाते थे।

मोदी सरकार ने 23 जनवरी को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की. कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किए जाने की मांग काफी समय से की जा रही थी. जेडीयू नेता केसी त्यागी ने ठाकुर को भारत रत्न देने के साथ-साथ उनके नाम पर विश्वविद्यालय खोलने की भी मांग की थी.

जननायक के नाम से थे मशहूर

कर्पूरी ठाकुर को भारत रत्न से सम्मानित किया जाना देर से लिया गया न्यायोचित कदम हैं. सामाजिक उत्थान में कर्पूरी ठाकुर का जो योगदान है वह अहम् अद्वित्य हैं. कर्पूरी ठाकुर जन नायक के नाम से मशहूर थे. एक छात्र कार्यकर्ता के रूप में, भारत छोड़ो आंदोलन में शामिल होने के लिए उन्होंने स्नातक की पढाई तक छोड़ दी थी।

26 महीने जेल में बिताये

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने 26 महीने जेल में भी बिताये थे. 1951 के पहले चुनाव से ही कर्पूरी ठाकुर कांग्रेस विरोधी राजनीती के अग्रिम योद्धा थे. 1960 में केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की आम हड़ताल के दौरान पी एंड टी कर्मचारियों का नेतृत्व करने के लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया था।

“संपूर्ण क्रांति” आंदोलन का किया था नेतृत्व

कर्पूरी ठाकुर ने टेल्को मजदूरों के हितों के लिए 1970 में 28 दिनों तक आमरण अनशन किया था। भारत में आपातकाल (1975-77) के दौरान जनता पार्टी के अन्य प्रमुख नेताओं के साथ कर्पूरी ठाकुर ने भारतीय समाज के अहिंसक परिवर्तन के उद्देश्य से “संपूर्ण क्रांति” आंदोलन का नेतृत्व भी किया था।

144 वोटों से जीतकर दूसरी बार बने थे बिहार के मुख्यमंत्री

पार्टी के अंदर कर्पूरी ठाकुर को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा. 1977 में जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद कर्पूरी ठाकुर बिहार जनता पार्टी के अध्यक्ष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के खिलाफ 84 के मुकाबले 144 वोटों से जीतकर दूसरी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने।

मुख्यमंत्री बने फिर भी झोपड़ी में रहे

कर्पूरी ठाकुर बिहार के समस्तीपुर के गांव पितौंझिया के निवासी थे। गांव में उनकी एक झोपड़ी बनी हुई थी. बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी वह उसी झोपड़ी में रहते थे। उनकी सादगी के चर्चे आज भी लोगों की जुबां पर हैं, उनके सम्मान में उनके गांव का नाम बदलकर कर्पूरीग्राम रख दिया गया है और उनकी झोपड़ी की जगह पर एक सामुदायिक भवन बनाया गया है.

पिछडों के लिए लड़ी लड़ाई

सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की सिफारिश करने वाली मुंगेरी लाल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने के बाद ठाकुर के फैसले के सवाल पर पार्टी में अंदरूनी कलह शुरू हो गई। जनता पार्टी के ऊंची जाति के सदस्यों ने ठाकुर को मुख्यमंत्री पद से हटाकर आरक्षण नीति को कमजोर करने की कोशिश की।

गरीबों के थे मसीहा

ठाकुर को गरीबों का मसीहा के रूप में भी जाना जाता था। 1978 में, कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्गों के लिए बिहार में 26% आरक्षण मॉडल पेश किया। इस स्तरित आरक्षण व्यवस्था में, अन्य पिछड़ा वर्ग को 12%, सर्वाधिक पिछड़े वर्ग को 8%, महिलाओं को 3% और उच्च जातियों में से आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों (ईबीडब्ल्यू) को राज्य सरकार की नौकरियों में 3% आरक्षण मिला।

पूर्ण शराबबंदी की थी लागू

कर्पूरी ठाकुर ने ताजपुर विधानसभा चुनाव से कई बार चुनाव लड़ा और हर बार जीत दर्ज़ की.1970 में बिहार के पहले गैर-कांग्रेसी समाजवादी मुख्यमंत्री बनने से पहले ठाकुर ने बिहार के मंत्री और उपमुख्यमंत्री के रूप में कार्य किया। जिसके बाद उन्होंने बिहार में पूर्ण शराबबंदी का नियम भी लागू किया था।

कभी किसी तरह के आरोप नहीं लगे

कर्पूरी ठाकुर पर कभी भी भ्रष्टाचार या परिवारवाद का आरोप नहीं लगा. यह वर्तमान के राजनीतिको के लिए एक सबक भी हैं. जुलाई 1979 में जनता पार्टी के विभाजन के बाद कर्पूरी ठाकुर ने निवर्तमान चरण सिंह गुट के साथ अपनी राजनीती को आगे बढ़ाया.

1980 के चुनावों में वे जनता पार्टी (सेक्युलर) के उम्मीदवार के रूप में बिहार विधानसभा के लिए समस्तीपुर (विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र) से चुने गए। जिसके बाद उनकी पार्टी ने अपना नाम बदलकर भारतीय लोक दल कर लिया और 1985 के चुनाव में ठाकुर को सोनबरसा निर्वाचन क्षेत्र से बिहार विधानसभा के उम्मीदवार के रूप में चुना गया था। लेकिन इस विधानसभा का कार्यकाल पूरा होता उससे पहले ही उनका निधन हो गया था।